दीपक अधिकारी
हल्द्वानी
SIR के नाम पर मताधिकार पर हमला बर्दाश्त नहीं, ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग
हल्द्वानी। वोट चोर-गद्दी छोड़ और संविधान बचाओ-लोकतंत्र बचाओ नारों के साथ गुरूवार को इंडिया गठबंधन की पार्टियों, छात्र संगठनों और नागरिक समाज ने हल्द्वानी के बुद्ध पार्क में संयुक्त रूप से धरना-प्रदर्शन और सत्याग्रह किया। धरने के बाद भारत की राष्ट्रपति महोदया को 6 सूत्रीय ज्ञापन भेजा गया। धरने में वक्ताओं ने कहा कि आज हम एक ऐसे सवाल पर बात करने के लिए इकट्ठा हुए हैं, जो केवल किसी राजनीतिक पार्टी की जीत या हार का सवाल नहीं है। यह सवाल है हमारे लोकतंत्र का, हमारे संविधान का और जनता के उस अधिकार का, जिसके बल पर हम सरकारें चुनते हैं। हमारे लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च है, लेकिन अगर मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया ही सवालों के घेरे में आ जाए, अगर किसी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची से गायब हो जाए, तो हमें पूछना ही होगा कि आखिर लोकतंत्र किस दिशा में जा रहा है?
निर्वाचन आयोग के भीतर से ही उठे सवाल – वक्ताओं का आरोप
वक्ताओं ने कहा कि 25 सितंबर 2026 को इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में सामने आया कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों के दौरान आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। ये कोई राजनीतिक आरोप नहीं थे, ये आपत्तियां उस संवैधानिक संस्था के भीतर से आई थीं, जिसे देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। सवाल केवल इतना नहीं है कि दो आयुक्तों और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के बीच मतभेद क्यों हुए। असली सवाल है, इन आपत्तियों में उठाए गए मुद्दों का संतोषजनक और पारदर्शी समाधान हुआ या नहीं? अगर पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए, तो उन्हें बहाल करने की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। वक्ताओं ने कहा कि लोकतंत्र केवल पांच साल में एक बार मतदान करने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है कि हर पात्र नागरिक को समान राजनीतिक अधिकार मिले, चुनाव निष्पक्ष हों और संवैधानिक संस्थाएं जनता के प्रति जवाबदेह रहें। वोट केवल एक बटन दबाने का नाम नहीं है। वोट वह अधिकार है जिसके माध्यम से एक गरीब मजदूर और एक अमीर उद्योगपति राजनीतिक रूप से समान नागरिक माने जाते हैं। यदि किसी गरीब का वोट छूटता है, तो उसकी आवाज कमजोर होती है।
राष्ट्रपति को भेजी गई 6 मांगें
ज्ञापन के माध्यम से राष्ट्रपति से ये मांगें की गईं:
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया को तत्काल वापस लिया जाए तथा इसकी निष्पक्ष एवं स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए।
मतदाता सूची से हटाए गए पात्र नागरिकों के नामों की जांच कर उन्हें नियमानुसार पुनः शामिल किया जाए।
किसी भी पात्र नागरिक को मतदान के संवैधानिक अधिकार से वंचित न किया जाए तथा प्रभावित नागरिकों को अपना पक्ष रखने और अपील करने का पर्याप्त अवसर मिले।
SIR प्रक्रिया और मतदाता सूची में नाम काटे जाने से संबंधित शिकायतों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं।
मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों के मद्देनजर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस्तीफे के लिए आदेशित किया जाए।
निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
कई संगठनों की रही मौजूदगी
धरना सत्याग्रह में उत्तराखंड सर्वोदय मंडल, कांग्रेस, भाकपा (माले), भाकपा, माकपा, आइसा, अखिल भारतीय किसान महासभा, परिवर्तनकामी छात्र संगठन, भीम आर्मी, आजाद समाज पार्टी, ऐक्टू, उत्तराखंड सद्भावना मंच, रचनात्मक कांग्रेस, उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी, आम आदमी पार्टी, अम्बेडकर मिशन सहित कई संगठन शामिल रहे। जिनमें मुख्य रूप से पूर्व सांसद प्रदीप टम्टा, प्रभात ध्यानी, भुवन पाठक, बहादुर सिंह जंगी, रवि चोपड़ा, हरीश ऐठाणी, ललित जोशी, यतीश पंत, अंजू राज, राजेन्द्र सिंह राजा, आकाश भारती, वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन रौतेला, दिनेश उपाध्याय, अब्दुल कादिर, चन्द्रशेखर भट्ट सहित कई लोग मौजूद रहे। धरने की अध्यक्षता इस्लाम हुसैन और संचालन डॉ. कैलाश पाण्डेय ने किया।





