दीपक अधिकारी
हल्द्वानी
काशीपुर के किसान सुखवंत सिंह की आत्महत्या का मामला बेहद दुखद है, लेकिन इस घटना की आड़ में जिले के कप्तान एसएसपी मणिकांत मिश्रा की छवि को धूमिल करना न्यायसंगत नहीं है। हमें तथ्यों को गहराई से समझना होगा:
कानूनी मजबूरी: जिन आरोपियों पर किसान ने आरोप लगाए, उन्हें नैनीताल हाईकोर्ट से सुरक्षा प्राप्त थी। कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करना ‘अवमानना’ (Contempt of Court) होता। ऐसे में एसएसपी के हाथ कानूनन बंधे हुए थे।
त्वरित कार्रवाई: जैसे ही लापरवाही की बात सामने आई, कप्तान ने तुरंत ITI थाना प्रभारी और उप-निरीक्षक को निलंबित किया और पूरी पैगा चौकी को लाइन हाजिर कर दिया। यह उनकी निष्पक्षता का प्रमाण है।
शानदार रिकॉर्ड: पिछले 1 साल में मणिकांत मिश्रा जी ने नशे के बड़े सिंडिकेट्स तोड़े हैं, बरेली जैसे इलाकों में घुसकर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की है और मानव तस्करी जैसे अपराधों पर लगाम लगाई है।
परिवार का भरोसा: खुद मृतक के भाई ने पुलिस कप्तान की अब तक की कार्रवाई पर संतोष जताया है।
बिना जांच के एक ईमानदार अफसर पर उंगली उठाना गलत है।
1. कोर्ट के आदेश का सम्मान:
पुलिस प्रशासन को अक्सर कटघरे में खड़ा किया जाता है, लेकिन यहाँ यह समझना जरूरी है कि जिन संदिग्धों पर कार्रवाई की मांग हो रही थी, उन्हें उच्च न्यायालय का संरक्षण प्राप्त था। पुलिस तंत्र कोर्ट के ऊपर नहीं जा सकता।
2. अनुशासन और पारदर्शिता:
एसएसपी मणिकांत मिश्रा ने घटना के बाद न केवल SIT (एसआईटी) का गठन किया, बल्कि लापरवाही बरतने वाले पुलिसकर्मियों को तुरंत सस्पेंड कर यह संदेश दिया कि वे अपने विभाग में भी ढिलाई बर्दाश्त नहीं करेंगे।
3. अपराध मुक्त जिले का संकल्प:
मणिकांत मिश्रा की पहचान एक ‘तेजतर्रार’ अफसर की है। उनके नेतृत्व में जिले की पुलिस ने उत्तर प्रदेश की सीमा में घुसकर नशा तस्करों को पकड़ा है। जिले की कानून व्यवस्था को सुधारने के लिए उन्होंने दिन-रात एक किया है।
किसी भी मामले में अंतिम निर्णय जांच के बाद ही आना चाहिए। एक कर्मठ अधिकारी, जिसने जिले की सुरक्षा के लिए कई उपलब्धियां हासिल की हों, उसे बिना जांच के दोषी मान लेना समाज और कानून दोनों के लिए घातक है



